वैवाहिक आमंत्रण
आत्मीय स्वजन, सुदूर के दो अपरिचित पथिक, बैठे हैं मंडप के नीचे, मिला रहे हैं जोत, दो बातियां एक हो रही हैं। अमरस में सनी सप्तपदी, पढ़ रहे हैं पंडितजी, दिला रहे हैं शपथ सहमति से साथ-साथ चलने की। दे रहे हैं आशीष, ग्रह, नक्षत्र और तारे खुश हैं हमारे संबंधी सारे। इस मंगलमय बेला में आप भी पधारें और प्रत्यूष और अनन्या को अपने शुभाशीषों से अभिसिंचित कर हमें अनुगृहीत करें। --- दया शंकर मिश्र x