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Showing posts from January, 2025

पत्नी संग कुंभ स्नान

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पत्नी संग महाकुंभ स्नान           मैं महाकुंभ नहाने जा रहा था, कि श्रीमती जी बिना कहे तैयार हो गईं। मैं और मेरे मित्र कार में बैठे थे, श्रीमती जी जबरदस्ती साथ में सवार हो गईं। कहने लगीं-संगम स्नान का महत्व तभी है, जब अपनी धर्मपत्नी साथ में डुबकी लगाये। मुझे साथ नहीं ले जाओगे, तो पता नहीं किसके साथ गंगा नहाओगे। इसलिये मैं तुम्हारे साथ चल रही हूं, इन दिनों तुम्हारा विशेष खयाल रख रही हूं। कुंभनगरी में जाकर खूब घूमा, स्नान किया। जगह-जगह जाकर संतामृत पान किया। एक संतजी बड़े भले लगे, हम तीनों उनकी कथा ध्यान से सुनने लगे। संतजी बोले, ये दुनिया फानी है, मानव बुलबुला है, दो दिन की जिंदगानी है। पैसा-रूपया तो हाथ की मैल है, उसके पीछे दौड़े जो, समझो कि बैल है। मैने कहा धन्य हो स्वामीजी, ये बात मेरी घरवाली को भी समझाइये। दो-चार अच्छी चीजें इनके हृदय में जगाइये। संतजी बोलते उससे पहले ही श्रीमती जी बोलीं , अपनी जगह से थोड़ा इधर-उधर डोलीं। बोलीं घर चलकर तुम्हारी सारी मैल उतार दूंगी। उस मैल को अपने भाई को उधार दूंगी। तुम संतजी के चेले हो, वैसे भी बड़े अलबेले ...

साली और मैं

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    साली और मैं एक बार आपनी साली को, मैने ज्यादा ही चिढ़ा दिया साली थी मेरी होशियार, उसने बहना को भिड़ा दिया तुमको दीदी, कुछ पता   भी है, जीजा   बाहर क्या करते हैं कहते हैं तुमसे करूं प्यार, लेकिन कविता पर मरते हैं। तुम इन पर नजर रखो वरना, एक दिन ऐसा  भी  आयेगा। तुम घर पर करवाचौथ रहो, बंदा ले कुड़ी उड़ जायेगा। इसलिये तुम्हें समझाती हूं, कविता   पर थोड़ी नजर रहे गंगा, यमुना, त्रिवेणी की फिर से न कोई रसधार बहे।। -     दया शंकर मिश्र “ सागर ” -     राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपुर -     मो. 9415429279    

स्वामी ढपोरशंख

                  स्वामी ढपोरशंख हमसे एक दिन मिलि गये, मि. सुघर, प्रवीन। हंसकर  बतलाने   लगे, हैं सब विद्या हीन।। हैं सब विद्या हीन, रात-दिन छाप रूपैया। रस्ते में जो मिलें, कहें सब भैया-भैया।। हेमामालिनि आके उनके तेल लगावैं। श्रीदेवी औ तब्बू आके, गोड़ दबावैं। कह स्वामी ढपोरशंख, ये सुख के दिन हैं। "श्री" को सब चाहैं जग में, को "देवी" बिन है।।

हास्य कविता (नारी सशक्तिकरण)

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        नारी सशक्तिकरण जब से श्रीमती जी को पता चला है कि, संस्थान की निदेशक  परोहा मैडम सहायक निदेशक मल्लिका मैडम और जैव रसायन प्रमुख लक्ष्मी मैडम हो गईं हैं उस दिन से मेरे घर की प्रमुख भी मेरी श्रीमती जी हो गईं हैं। अब घर पर मेरी नहीं, उन की ही चलती है जल्दी से मेरी वहां, दाल नहीं गलती है। जब भी चंडी रूप धारण करती हैं, कहती हैं सब तुम्हारी ही गलती है।। विवाह से पूर्व मैं नहीं जानती थी कि, तुम कविता भी लिखते हो, पहले तो ऐसे नहीं लिखते थे, जैसे अब लिखते हो। मुझे पता चल जाता, तो मैं तुमसे शादी ही नहीं करती। तुम भी मोदी, योगी और अटल की तरह कुंवारे ही रहते और कुछ करते न करते, देश की सेवा तो करते। अरे, कवियों की कोई औकात होती है// महिलाओं के सामने पुरूषों की कोई बिसात होती है। संस्थान को मैडम ने और घर को हमने संभाला है हमारी ही बदौलत, तुम सबके मुंह में, समय से जाता निवाला है। क्या तुम जैसे सांप को हमने इसीलिये पाला है। सच कहती हूं, कभी-कभी मुझे लगता है, तुम्हारा दिल ही काला है। कभी खुद भोजन पकाओ तो जान जाओगे कि, कितनी मशक्कत के बाद नारी अन्नपूर्णा बनती है। रोटी जैस...

सुहाने दिन

सुहाने दिन उन्हें आजमाने के दिन आ गये हैं। लो खुशियां मनाने के दिन आ गये हैं। यादों की बारात लेकर वो आये, सखी अब सुहाने से दिन आ गये हैं। उन्हें हमने सपनों में देखा था अकसर, लो मिलने-मिलाने के दिन आ गये हैं। वो पत्थर नहीं हैं, नरम दिल है उनका, अब उनको मनाने के दिन आ गये हैं। सखी अब सुहाने से दिन आ गये हैं।                    --0-- दया शंकर मिश्र "सागर"

कंजूसानंद

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  कंजूसानंद एक दिन सुबह से ही मेरे एक महा कंजूस मित्र की बार-बार लंबी-लंबी रिंगें आ रही थीं। उसका नाम और नंबर देखकर मेरी श्रीमती जी घबरा रही थीं।। मुझे भी कुछ अटपटा सा लग रहा था जैसे कुछ अनहोनी होने वाली हो, बिजली चमक रही हौ और आंधी आने वाली हो, सूरज भी डरकर बादलों के बीच छुप गया हो। वो मित्र जो किसी को भी काल नहीं करता हो अपना सारा काम मिसकाल से ही करता हो। वेतन की सारी रकम बैंक में ही भरता हो। पैसा न खर्चे चाहे कोई जीता हो या मरता हो। आज लंबी-लंबी कालें कर रहा है। हम लोगों ने उसे स्वामी कंजूसानंद की उपाधि दे डाली थी। जब भी मिले, बोले जेब मेरी खाली थी। बीवी भी उसकी बड़ी ही दिलवाली थी वो शेर था तो वो भी सवाशेर थी मुहल्ले में अपने, मांगने के लिये मशहूर थी बिना मांगे खाना उनका हजम नहीं होता था जब तक न मांग ले मित्र नहीं सोता था उनकी करतूतों से पड़ोसी बेचारा रोता था जिसका ले लेता था, उसका नहीं देता था। कंजूसानंद की उपाधि जिसने पाई थी। उसकी न जाने कितनी ऊपरी कमाई थी आउटगोइंग से बहुत जियादा, जिसकी इनकमिंग थी, आज वो अपना उसूल तोड़ रहा है। शायद, न्यू जनरेशन से, अपना रिश्ता जोड़ रहा है...

नववर्ष की शुभकामना

  नववर्ष की शुभकामना दोस्तो, आप सबको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें आप सब खुशियां मनायें। आशा   ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि आगत वर्ष, आप सबके लिये आम नहीं, खास होगा। इस बात का आपको भी, निश्चय ही अहसास होगा। जब आपका कोई चाहने वाला, आपके आसपास होगा. तो कैसे नहीं आपको खुशियों का आभास होगा। हटेंगें तिमिर रूपी दुखों के बादल, आपकी मेधा के होंगें सभी कायल, वो लम्हा ही आपके लिये, बहुत ही खास होगा। बढ़ेगा विदेशी निवेश, देश में तो निश्चय ही हम सबका विकास होगा। खुलेंगें ज्ञान-चक्षु भी हमारे, देश हमारा विश्वगुरू होगा है बैठा कोई मनस्वी प्रशासक, जिससे हैं विचलित मानवता विनाशक। मन में जिनके हो विश्व-बंधुत्व की भावना, जो रात-दिन करें सबके सुख की कामना। वो योगी ही होगा औ उसके हृदय में, निश्चय ही पुण्यात्मा वास होगा फैलेगी उसके सुकार्यों की खुशबू, तो संस्था का अपने भी विकास होगा संकल्प मन में शुभ सदा और हो शुभ भावना शुभ आज है, कल भी रहे, दुख का न हो कभी सामना। कुछ फूल खुशियों के खिलें, कुछ सुमन श्रद्धा के चढ़ें। तो देवता भी दें अशीष कि- आप आगे ...

मेरी जान तुम बरेली चलो

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  मेरी जान तुम बरेली चलो      यहां की रोड पे है जाम, तुम बरेली चलो। यहां पे मेरा नहीं काम, तुम बरेली चलो। तुम्हें बचा न सकूंगा मैं, मेरी जान, तुम बरेली चलो। यहां बिगड़ते बने काम, तुम बरेली चलो। कत्लो गारत की रात है “ सागर ” , नहीं महफूज जनो आम, तुम बरेली चलो। वहां के झुमके के, सुने हैं बड़े ही चर्चे। देख लेंगें उसे हम भी तो सरेशाम, तुम बरेली चलो पैग पटियाला पी के, रात अपनी गुजरेगी, होगी मदहोश अपनी शाम, तुम बरेली चलो। बेवफाओं का यहां पे हुजूम है “ सागर ” , हम भी तो हो गये बदनाम, तुम बरेली चलो। सूखा इनकी नजर का धीरे-धीरे है पानी, आगे होगा क्या अंजाम, तुम बरेली चलो। --00—                  दया शंकर मिश्र “ सागर ”                 मो. 9415429279