पत्नी संग कुंभ स्नान
पत्नी संग महाकुंभ स्नान
मैं महाकुंभ नहाने जा रहा था, कि श्रीमती जी बिना कहे
तैयार हो गईं।
मैं और मेरे मित्र कार में बैठे थे, श्रीमती जी जबरदस्ती
साथ में सवार हो गईं।
कहने लगीं-संगम स्नान का महत्व तभी है, जब अपनी
धर्मपत्नी साथ में डुबकी लगाये।
मुझे साथ नहीं ले जाओगे, तो पता नहीं किसके साथ गंगा
नहाओगे।
इसलिये मैं तुम्हारे साथ चल रही हूं, इन दिनों तुम्हारा
विशेष खयाल रख रही हूं।
कुंभनगरी में जाकर खूब घूमा, स्नान किया। जगह-जगह जाकर
संतामृत पान किया।
एक संतजी बड़े भले लगे, हम तीनों उनकी कथा ध्यान से सुनने
लगे।
संतजी बोले, ये दुनिया फानी है, मानव बुलबुला है, दो दिन
की जिंदगानी है।
पैसा-रूपया तो हाथ की मैल है, उसके पीछे दौड़े जो, समझो
कि बैल है।
मैने कहा धन्य हो स्वामीजी, ये बात मेरी घरवाली को भी
समझाइये।
दो-चार अच्छी चीजें इनके हृदय में जगाइये।
संतजी बोलते उससे पहले ही श्रीमती जी बोलीं, अपनी
जगह से थोड़ा इधर-उधर डोलीं।
बोलीं घर चलकर तुम्हारी सारी मैल उतार दूंगी। उस मैल को
अपने भाई को उधार दूंगी।
तुम संतजी के चेले हो, वैसे भी बड़े अलबेले हो।
मैल अपने पास मत रखा करो, अच्छा नहीं लगता है।
मेले में आगे बढ़ा, तो उनकी एक सुंदर सी सहेली मिल गई।
वो सहेली शीघ्र ही मुझसे घुलमिल गई।
पत्नी ने पूछा-तुम्हारे पति कहां हैं, उनको साथ नहीं
लाई,
सहेली बोली-वो घर पर नहीं थे, अकेली ही चली आई।।
मेरी शंकालु पत्नी को और शंका हो गई, उनकी छठी इंद्री शीघ्र
जागृत हो गई।
ये भी अकेली आई है, ये भी अकेले आने वाले थे
क्या इसी कलमुंही के संग, डुबकी लगाने वाले थे।
--0-- दया शंकर मिश्र “सागर”
राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपुर मो.9415429279
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