फुलवारी हैं बेटियां
फुलवारी हैं बेटियां आज दूर क्षितिज में, उन्मुक्त पंछियों की तरह, अनवरत उड़ान, भरती हैं बेटियां। कठिन और श्रमसाध्य, समझी जाने वाली। दुरूह और दुष्कर राहों को, सुगम बनाती हैं बेटियां। घरों को ही नहीं, संसार को भी, मंदिर की तरह, सजा-संवारकर पूजा के लायक, बनाती हैं बेटियां। जिस घर में बेटी न हो वो घर सूना-सूना रहता है बेटे हैं फूल तो फुलवारी हैं बेटियां। फुलवारी हैं बेटियां। --00— -- दया शंकर मिश्र, “ सागर ” ...