कर्ज चुकता
कर्ज चुकता
दया शंकर मिश्र,
आशुलिपिक, NSI,
कानपुर
विवाह के दस वर्ष उपरांत जय के घर में
किलकारियां गूंजी तो जय और जय के माता-पिता की खुशी का पारावार न रहा। इन दस
वर्षों में जय और उसकी पत्नी राधा ने न जाने कितनी मन्नतें मानी थीं और कितने
देवी-देवताओं के दर पर मत्था टेका था। गांव की औरतें अकसर जय की मां से उलाहना
जैसे देतीं और कहतीं-सुधा तुम्हारी बहू में ही कोई कमी है, वरना इसके साथ जिनके
हाथ पीले हुये थे, उनके दो-दो बच्चे हैं। हंसता-खेलता परिवार कई बार इस प्रकार के
तानों से परेशान हो जाता। हालांकि वे स्वयं किसी से कुछ नहीं कहते थे, उन्हें
भगवान के न्याय पर पूरा भरोसा था। वे मानते थे कि एक दिन उनकी बगिया में सुंदर
पुष्प अवश्य खिलेगा।
दिन-महीने-साल इसी प्रत्याशा में बीतते रहे
और उसकी परिणतिस्वरूप आज मीठा फल मिला था। सुधा के अतीत के चलचित्र में सारी
तस्वीरें घूम रही थीं। वह खाका खींच रही थी भविष्य के तानों-बानों का। मुन्ने का
क्या नाम रखना होगा, कौन-कौन से आयोजन, कब-कब किये जाने हैं। किस-किस को आमंत्रित
करना होगा, ऩाऊ, पंडित, परजा सभी को खुशियों में शरीक करना होगा। जो मनौतियां,
मन्नतें, प्रार्थना की हैं, देवी-देवताओं से वादा किया है, सभी को पूरा भी तो करना
होगा। भगवान को अप्रसन्न नहीं किया जा सकता। आम मानस की तरह सुधा और सुंदर भी
धर्मभीरू थे, धर्म पर उनकी गहन आस्था थी। सामान्य तौर पर आदमी, आदमी से किये गये
वादे को झुठला सकता है, लेकिन भगवान को कैसे धोखा दें, वो तो पग-पग पर, कण-कण में
विराजमान हैं। कितने लंबे अरसे के बाद तो बहू की गोद हरी हुई है। क्या सारा काम
सेंत-मेत में ही हो जायेगा। उसने श्रीसत्यनारायण व्रत कथा श्रवण की थी। उसको भगवान
से वादा करे पूरा न करने पर साहूकार का क्या हश्र हुआ था, पता था। सोचते-सोचते कब
शाम हुई और सुधा को कब नींद ने अपने आगोश में ले लिया पता ही नहीं चला।
सूर्य की किरणों के आगमन के साथ ही सुधा के
कक्ष में उसके पति सुंदर ने प्रवेश किया। कई बार आवाज देने पर भी सुधा की नींद न
खुलने पर सुंदर ने उसे झिंझोड़कर जगाया तो वह चौंक उठी। सुंदर समझ गया सुधा
निश्चित रूप से कोई मीठा सपना देख रही थी, हालांकि सुधा ने सुंदर से ये सब नहीं
बताया, लेकिन सुंदर कोई दूध पीता बच्चा तो नहीं था। उसने स्वयं ही उसको
छेड़ा-क्यों सोहर गाने के लिये गांव की औरतों को नहीं बुलाओगी, जय के बेटा हुआ है।
भगवान ने हमें जो आशीष दिया है, उस खुशी को हम पूरे गांव के साथ बांटेंगें। सुधा
पुनः चुप हो गई। सोचने लगी इस साल फसल भी अच्छी नहीं हुई है, जय जहां काम करता था,
उस मालिक ने दो महीने की पगार भी रोक ली है। कैसे सब कुछ होगा। हे रासबिहारी, अब
तो तुम्हारी ही शरण में हूं। द्रोपदी की चीर बढ़ाकर आपने उसकी लाज तो बचा ली थी,
मेरी कैसे बचायेंगें। जय ने कहा-कितना सोचोगी। अरे बाहर आंगन में गांव की औरतें
बच्चे का मुंह देखने आई हैं, सब मुंह मीठा करवाने की बात कर रही हैं और तुम हो कि
अभी भी सो ही रही हो। हूं, सुधा चिंहुक उठी, उसकी आंखों में चमक और शरीर में एकदम
से जान आ गई। तुरंत उठकर बाहर निकल गई और जय देखता ही रह गया।
आंगन में मोहल्ले की तमाम औरतें जमा थीं।
चर्चा छिड़ी थी-किसकी मन्नत से राधा के घर का चिराग रोशन हुआ है। सभी के अपने तर्क
और विचार थे, परंतु सुधा ने कुछ भी स्पष्ट न कहा। यही कहकर चुप रह गई कि आप सबके
आशीष से बहू की गोद भरी है। भगवान तो सबके ऊपर हैं हीं। मैं सबकी कृतज्ञ हूं। सुधा
की स्थिति उस भिखारी जैसी थी, जिसके हाथ एकदम से खजाना लग जाये और वह कुछ भी
निश्चय न कर पा रहा हो कि इसे दिखाऊं या छिपाऊँ। किसी ने चुहल किया, बिल्कुल अपने
बाप पर गया है- वही नाक, वही मुंह कितना सुंदर है। कितने सुंदर बाल हैं।
सांवला-सलोना कन्हैया है, किसी की नजर न लगे अभी से हंस रहा है। राधा सौर से सारी
बातें कान लगाकर सुन रही थी और पुलकित हो रही थी। उसी दिन उसका नामकरण-कन्हैया हो
गया। सब उसको प्यार से कान्हा-कान्हा कहने लगे। हर मां की तरह राधा को भी अपना लाल
सबसे सुंदर लग रहा था और सुधा इस बात को लेकर चिंतित थी कि उसने बच्चे को काला
टीका क्यों नहीं लगाया। ये औरतें पता नहीं कौन कैसी हैं, बच्चे को नजर न लग जाये,
हे प्रभू रक्षा करना। हे शनि महराज तुम्हारा ही आसरा है। तभी उसकी बेटी रक्षा जो अपनी
उमर से कुछ ज्यादा ही समझदार हो चुकी थी या परिस्थितियों ने उसे बना दिया था,
बच्चे को लेकर वहां से हट गई और सुधा की जान में जान आई। धीरे-धीरे मोहल्ले की
औरतें अपने-अपने घर चली गईं तो सुधा ने रक्षा को ताकीद की-खबरदार जो बच्चे को बिना
काला टीका लगाये बाहर लाई। पता नहीं किसके मन में क्या है। किसकी नजर खोटी है,
भगवान जानें।
समय पंख लगाकर उड़ता रहा और कन्हैया शुक्लपक्ष
के चांद की तरह बढ़ता रहा। उम्र के साथ उसमें चंचलता आई और वह मुहल्ले का प्रिय
खिलौना हो गया। उसका तुतलाकर बोलना, दूधिया दातों की हंसी मां-बाप की थकान को दूर
कर देती थी। दादा-दादी का खाली समय कन्हैया के साथ ही बीतता था। कन्हैया सभी की
आंखों का तारा और पड़ोसियो का दुलारा था।
कन्हैया
अब बड़ा हो चुका था और उसका दाखिला विद्यालय में करवा दिया गया था। उस पर ईश्वर की
विशेष कृपा थी, पढ़ने और खेलने दोनों में ही कन्हैया का कोई जोड़ नहीं थी।
विद्यालय के बाद विश्वविद्यालय हर जगह कन्हैया ने अपने नाम का डंका बजाया औरस समय
पर अच्छी पोजीशन के साथ प्रशासनिक सेवा में नौकरी प्राप्त की। दादा-दादी दोनों
काल-कवलित हो चुके था, लेकिन मां-बाप का सीना गर्व से चौड़ा हो रहा था। तमाम
नाते-रिश्तेदारी, परिवार, गांव को भोज दिया गया। सभी खुश थे।
अब
कन्हैया के लिये उपयुक्त बहू की तलाश शुरू हुई। जिस परिवेश में कन्हैया पला-बढ़ा
था, उन परिवारों की लड़कियां उसको रास नहीं आ रही थीं। समय के साथ कन्हैया की
आकांक्षायें और विचार भी ऊंचे हो चुके थे। अब वह गांव वाला कान्हा नहीं था, शहर का
आधुनिक विचारों वाला कन्हैया था। वो कन्हैया जिसका बाप ने कभी मांस-मदिरा को
स्वप्न में भी हाथ नहीं लगाता था, उनका पुत्र सर्वभक्षी हो चुका था। जब खान-पान
में बदलाव हुआ तो विचारों में भी बदलाव स्वाभाविक था। पिता की पसंद की हुई बहू
पुत्र को कैसे भाती। पिता भारतीय संस्कृति के मुरीद थे तो पुत्र पाश्चात्य सभ्यता
में रंग चुका था। केर और बेर का संग कैसे संभव हो सकता है। जय ने हारकर कहा- बेटा
तुम अपनी पसंद की बहू लाओ, तुम्हारी खुशी में ही हमारी खुशी है। कन्हैया की मुराद
पूरी हुई, उसने अखबारों के माध्यम से, वैवाहिक विज्ञापनों से अपने अनुरूप
पाश्चात्य विचारों वाली नौकरीपेशा सुंदरी का चयन किया। काफी धूमधाम से विवाह हुआ
और विवाह के उपरांत मीनाक्षी (पत्नी) घर आई तो कन्हैया अपनी गृहस्थी और नौकरी में
मस्त हो गया। मां-बाप गांव में ही रहे क्योंकि उनको शहरी आबोहवा और बहू का आचरण,
व्यवहार भा नहीं रहा था। धीरे-धीरे कन्हैया जो अपनी मां-बाप की इकलौती संतान था ने
भी विचारों में अंतर और स्टेटस के अनुरूप मां-बाप के न होने के कारण उनसे दूरी
बढ़ानी आरंभ कर दी। जय और राधा ने जो सपने देखे थे, बेटे का विवाह होगा, छोटे-छोटे
बच्चे होंगें, उनको गोदी में लेकर वह खिलायेगा, उसका घोड़ा बनेगा, वे सब बिखरने
लगे थे। दोनों ने परिस्थितियों से समझौता किया और अपने आपको ग्रामीण परिवेश में
पुनः व्यस्त कर लिया। समय का पहिया चलता रहा। कभी-कभार कन्हैया घूमने के लिये
दो-चार घंटे को मां-बाप के पास जाता, लेकिन उसकी पत्नी को अनपढ़, गंवार सास-ससुर
कभी पसंद न आने के कारण धीरे-धीरे वह भी बंद हो गया। जय कभी-कभी गर्व से कहता मेरा
बेटा कलेक्टर है, लेकिन अंतर्मन से सोचता क्या हम दोनों के बीच अपनत्व की जो डोर
होनी चाहिये थी, वह जुड़ी है। वही कन्हैया जिसको छींक आने पर भी हम दोनों रात-रात
भर सोते नहीं थे, हकीम-वैद के चक्कर लगाते थे, आज हमारी सुधि लेने भी नहीं आता।
कभी-कभार केवल फोन से हाल-चाल पूछने की औपचारिकता निभाता है।
बालों
में सफेदी और आंखों की रोशनी कम होने के साथ-साथ जय की कमर भी झुक चुकी थी। उसको
लगता था कि वक्त के साथ-साथ उसके अपने भी उसका साथ छोड़ रहे हैं। मानसिक चिंताओं
ने जय को कृशकाय और रोगग्रसित कर दिया। वह जय, जो कभी बीमार नहीं पड़ता था आज
दवाइयों के सहारे जीने को मजबूर था। एक समय ऐसा भी आया कि जय फालिज का शिकार हो
गया। खबर कन्हैया के पास गई, कुछ समय के लिये कन्हैया गांव आया और जय को ले जाकर
अस्पताल में भर्ती करवा दिया। जय को उपचार के साथ-साथ पुत्र के मानसिक सहारे की
जरूरत थी, जो कन्हैया नहीं समझ सका और ऩ जय कह सका। दवा और दुआ के बावजूद जय एक
दिन रात में हृदयाघात (हार्टअटैक) से चल बसा। सुबह राधा ने निश्चल और अपलक खुली
आंखों से लेटे जय को देखा तो रोने-पीटने लगी, लेकिन होता क्या पंछी पिंजरे से निकल
कर उड़ चुका था। आत्मा परमात्मा के पास पलायन कर चुकी थी।
कन्हैया
खबर पाकर आया और पहली बार उसको अनुभूत हुआ कि मेरा कुछ खो गया है। पिता की पथराई
आंखें उससे बहुत कुछ कह रही थीं। क्रिया-कर्म करने के उपरांत कन्हैया का मन पुरानी
घटनाओं को सोच-सोचकर कुछ विरक्त सा हो गया था। कन्हैया को उस रात एक सपना आया
जिसमें बचपन से लेकर यौवन तक का सारा चलचित्र उसने देखा। मां-बाप के त्याग,
उत्सर्ग का पहली बार उसको भान हुआ। कैसे बचपन में उसके मल-मूत्र त्याग कर देने पर
मां नाराज नहीं होती थी, उसको सूखे की तरफ करके खुद गीले पर सो जाती थी। जय खुद
अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर उसके लिये सुख-सुविधा की चीजें जुटाता था। उसके लिये
घोड़ा बन जाता था। फटे जूते पहनकर उसको नये जूते दिलाता था। कन्हैया अपराधबोध से
ग्रस्त था। उसको पहली बार
अपना
बर्ताव बहुत बुरा लग रहा था। मुझे धिक्कार है, मैने मां-बाप के लिये कुछ नहीं
किया। । उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे। वह सोच रहा था, क्या मेरा बेटा
भी इसी प्रकार मेरे साथ बर्ताव करेगा। इसी बीच सीन बदलता है, कन्हैया के मां-बाप
दोनों उससे आकर पूछते हैं-
मैने
तो अपना कर्ज चुकता कर दिया, तुम कब चुकाओगे।
--=X+0+X=--
दया शंकर मिश्र,
आशुलिपिक, NSI,
कानपुर
भगवान का फैसला
दया शंकर मिश्र,
आशुलिपिक, NSI,
कानपुर
हां मुझे अच्छी तरह याद है उसका नाम मैकूलाल
ही था। नं. एक का मुकदमेबाज, धोखेबाज, लोगों को अपनी बातों में फंसाकर, विश्वास
दिलाकर अपना उल्लू सीधा कर लेना उसकी फितरत थी। एक बात थी, सब कुछ होते हुये भी
उसने अपने जीवन में कभी भी नशे का दामन नहीं थामा। उसे प्यार था तो केवल दौलत से,
फिर वह चाहे नैतिक या अनैतिक किसी भी तरह से आये, आना चाहिये।
अपने बाप की इकलौती संतान था वह। विरासत में
काफी जमीन-जायदाद मिली थी उसको। मैकूलाल
ने अपनी मेहनत से पहले तो उसको बढ़ाया। बाद में जब उसकी पत्नी रामरती के कोई
संतान नहीं हुई तो प्रौढ़ावस्था में उसने अपने से कम उमर की लड़की से ब्याह रचाया।
दौलत की लालच और सामर्थ्यवान न होने के चलते
लड़कीवालों ने अपनी आंखें बंद कर लीं और लगभग दूनी उमर के दूल्हे से ब्याह
रचा दिया। कुछ समयोपरांत जब घर में किलकारियां गूंजी तो मैकूलाल को लगा कि मेरा वारिस आ गया है। वारिस
के आने के साथ ही पहली पत्नी जो कि कुष्ठ एवं अन्य रोगों से ग्रस्त हो चुकी थीं का
तिरस्कार होना आरंभ हो गया। प्रकृति का नियम है कि व्यक्ति उसी की कदर करता है,
जिसके पास कुछ होता है। अकिंचन को कौन भाव देता है। वह बेचारी, जो पहले घर की
मालकिन थी, सारे मजदूर जिसके कहने पर दौड़ पड़ते थे आज एकाएक अपने आपको असहाय
समझने लगी थी।
इस बीच मैकूलाल का शातिर दिमाग अपनी ससुराल की
प्रापर्टी की तरफ घूमा। उसको लगा कि उसके सास-ससुर तो वृद्ध हैं ही, उनके कोई और
जीवित संतान नहीं है तो क्यों न उनके जीते-जी सारा माल-असबाब अपने नाम करा लिया
जाय। मैकूलाल ऩे अपनी ससुराल जाने की
बारंबारता बढ़ा दी। उसकी नजर में अब सास-ससुर की सेवा से बढ़कर कुछ था ही नहीं।
चूंकि मां-बाप पहले ही स्वर्गारोहण कर चुके था, अतः उन वृद्धों के बारे में चिंता
करने की कोई बात ही नहीं थी। मैकूलाल की
पहली पत्नी रामवती जो कि पढ़ी-लिखी तो नहीं थी, लेकिन जिस वातावरण में पली-बढ़ी थी
उसका असर उस पर था। वह अपने मान-अपमान का विशेष ध्यान रखती थी। गलत-सही के मामले
में वह केवल और केवल अपनी अंतरात्मा की बात ही सुनती थी। उसको शंका हो गई कि जो मायके
की धन-दौलत है, उसको ये निश्चित रूप से अपने कब्जे में करना चाहते हैं। भारतीय
संस्कारी नारियों की तरह यद्यपि रामरती ने ज्यादा विरोध नहीं किया लेकिन खुले
शब्दों में कह जरूर दिया कि मेरी अपनी कोई संतान नहीं है, मेरे मां-बाप की
जमीन-जायदाद पर मेरे चचेरे भाई-भतीजों का ही हक रहेगा। फैसला सुनाते हुये रामरती
ने कहा कि मैं मैके की संपत्ति को लेना उचित नहीं समझती हूं, क्योंकि मेरे पिताजी
की भी यही इच्छा है।
मैकूलाल
जानता था कि रामरती के निर्णय को बदलना असंभव है, अतः उसने शातिर दिमाग का उपयोग
किया और कहा कि मैं भी वहां की जमीन को लेना उचित नहीं समझता हूं, लेकिन तुम्हारे
वृद्ध मां-बाप और तुम्हारे इलाज में खर्चे के लिये अगर तुम कहो तो कुछ हिस्सा बेच
दिया जाय। काफी समझाने पर रामरती इसके लिये सहमत हो गई। मैकू ने महंगी जमीनों पर
कार्यवाही आरंभ कर दी। छोटे-छोटे टुक्ड़ों को हेर-फेर करके बेचना और पैसों का
उपभोग करना आरंभ कर दिया। पहलो जो जमीन बेची, उससे कुछ इलाज में खर्चा किया और
बाकी पैसों से रामरती के नाम जो जमीन ससुराल में थी, उस पर ट्रैक्टर फाइनेंस करवा
दिया। मैकू की सोच थी कि यद्यपि ट्रैक्टर की किश्त तो दे ही दी जायेगी, लेकिन अगर
कुछ गड़बड़ हुआ तो सारा दोष रामरती के सिर ही आना चाहिये। वह अपने या अपनी दूसरी पत्नी
पर कोई भी आंच नहीं आने देना चाहता था। खैर, इलाज के नाम पर पुनः जमीन बिकी और
अबकी बार घर में आने-जाने की दिक्कत बताकर बोलेरो खरीद ली गई। इस तरह से इलाज होता
रहा और मैकू सुविधाओं में अभिवृद्धि करता रहा। कुछ दिनों उपरांत रामरती को यह समझ
में आ गया कि मेरा इलाज कम और ये अपना इलाज ज्यादा कर रहे हैं तो वह बागी हो गई।
खुले शब्दों में अल्टीमेटम देते हुया कहा कि चाहे मेरी जान रहे या जाये, अब और
जमीन नहीं बिकेगी।
समय का चक्र घूमता रहा। मैकूलाल का सुपुत्र धीरे-धीरे बड़ा होने लगा।
यद्यपि उनकी पूर्व पत्नी द्वारा बच्चे को भरपूर लाड़-प्यार दिया जाता था। पूरा
खयाल रखा जाता था कि बच्चे को कोई तकलीफ न हो, पर सगी मां तो सगी मां होती है।
पहली पत्नी को कहीं-न-कहीं इस बात की टीस रहती थी कि काश मेरे भी संतान होती तो
इनको दूसरी शादी करने की आवश्यकता न पड़ती।
कुछ समय के उपरांत रामरती के पिताजी का
स्वर्गारोहण हो गया। मायके में सौतेली मां बची। मैकू ने पुनः अपना जाल बिछाना
चाहा, लेकिन सफल नहीं हो पाया। रामरती के पिताजी के नाम की जमीन आधी रामरती की
सौतेली मां और आधी रामरती के नाम हो गई। मैकू निरंतर रामरती के मायके जाता रहा और
अपने प्रभाव का विस्तार करता रहा। उसने रामरती के भाइयों तथा गांव वालों को यह
विश्वास दिलाया कि भगवान का दिया उसके पास सब कुछ है। उसको यहां की संपत्ति नहीं
चाहिये। यहां कि संपत्ति को वह सब लोगों में सासू मां की मृत्यु के उपरांत बराबर
बराबर बांट देगा। उसने अपने विश्वास का ऐसा जादू चलाया कि सब लोग उसके प्रभाव में
आ गये। सोचने लगे कितना त्यागी पुरूष है, कुछ भी नहीं लेना चाहता है, जबकि चाहे तो
सब कुछ ले सकता है। लेकिन सच्चाई क्या है, भगवान या मैकू ही जानते थे।
रामरती
की सौतेली मां के देहावसान के उपरांत मैकू ने पारिवारिक सचरा में ग्रामसभा में
रामरती की मां का नाम परगिया (जो पहले ही मर चुकी थीं) के स्थान पर सौतेली मां की
जमीन को धोखे से लेने के लिये गनेशिया दिखाया। कई ग्रामवासियों ने अपने ईमान को
बेचते हुये उस सचरे को सही बताया जबकि कुछ लोगों ने विरोध कर दिया। ग्रामसभा से
सचरा पास नहीं हुआ। मैकू ने इसे अपनी बड़ी हार मानी। उसने सफाई दी कि रामरती की
दोनों ही मां हैं- चाहे परगिया कहो या गनेशिय़ा। लोगों ने जब कहा कि सही नाम क्यों
नहीं लिख रहे हैं तो इस बात का उत्तर मैकू नहीं दे पाया।
बात
रामरती तक भी पहुंची लेकिन मैकू ने सब कुछ बैलेंस कर दिया। मां-बाप के मरने के
उपरांत भी रामरती को उसके मायके वाले काफी मान-सम्मान देते रहे। हर मांगलिक अवसर
पर उसको सबसे पहले याद किया जाता था। पता नहीं इसके पीछे दौलत की लालसा थी या मैकू
का दिया हुआ वचन कि मैं संपत्ति सब लोगों में बांट दूंग। कहा नहीं जा सकता कौन सी
बात भारी थी। एक बार रामरती जब अपने मायके गईं तो उसने कहा कि मुझे लगता है कि मैं
अब ज्यादा दिन चल नहीं पाऊंगीं, अतः मेरे नाम जो भी जमीन-जायदाद है, उसको तुम लोग
बराबर-बराबर लिखवा लो। खैर, कुछ पंचों को बुलवाकर रामरती की मायके पक्ष वालों के
लिये रामरती का अंगूठा लगवाकर वसीयत तैयार करवा दी गई।
मायके पक्षवाले
ज्यादा चालाक नहीं थे। संपत्ति मुस्तरका (सहखाते में) थी, आपसी सहमति से सभी लोग
खेती-बाड़ी कर रहे थे। उनको इस बात का गुमान ही नहीं था कि वह व्यक्ति जो इतने
बड़े-बड़े आदर्शों की बातें कर रहा है, उनके साथ धोखा भी कर सकता है। कुछ दिनों के
उपरांत रामरती भगवान के घर चली गईं। अपने जीवन काल में रामरती ने मैकू के नामे
जमीन नहीं करवायी तो नहीं करवायी। उसकी मृत्यु के उपरांत मैकू ने वारिसाने के आधार
पर अपना नाम चढ़वाने के लिये मायके पक्षवालों को बिना सूचित किये तहसील में वारिसाना
के लिये आवेदन किया। वारिसाना के आधार पर काम नहीं बना तो मैकू ने फर्जी वसीयतनामा
तैयार कर उसके आधार पर जमीन अपने नामे करवाने के लिये तहसील में धनबल का प्रयोग
करते हुये साठ-गांठ की।
इधर जब
रामरती के मायके वालों को मैकू के कृत्य की जानकारी हुई तो उन्होंने भी तहसील में
इसको रोकने के लिये अपनी वसीयत प्रस्तुत करते हुये दावा किया। तहसील कर्मी चूंकि
मैकू के हाथों पहले ही बिक चुके थे, अतः उन्होंने यह विचार न करते हुये कि जब इस
आदमी के पास वसीयत थी तो वारिसाना क्यों करवा रहा था, रामरती के नाम की जमीन पर
मैकू का नाम चढ़ा दिया। मायके पक्ष वाले
भी तब तक मैकू की शराफत को समझ चुके थे। उन्होंने मिलकर जमीन पर कब्जे के साथ-साथ
सिविल न्यायालय व एस.डी.ओ. के यहां केस दायर कर दिया। अब मैकू की समझ में नहीं आ
रहा था कि क्या करें। उसने समझा था कि मामले को चोरी-चोरी ही रफा-दफा कर लेगें,
लेकिन पांसा पलट गया। मैकू ने कुछ लोगों से रामरती की जमीन को बेचने के लिये
एडवांस भी ले लिया था। उसको लौटाने के लिये उसको अपनी जमीन बेचनी पड़ी।
अपने आपको
राजनीति में लाने के लिये मैकू ने प्रधान का चुनाव भी लड़ा और सफल भी हुआ। कुछ दिन
तक लोगों को बेवकूफ बनाता रहा, लेकिन जब जनता-जनार्दन ने सच्चाई समझी तो मैकू को
चुनना बंद कर दिया। मैकू अपने आपको विधायक बनाना चाहता था, लेकिन रामरती की मृत्यु
के साथ ही उसके घर की श्री सच्चे अर्थों में चली गयी। वही कामवाले जो रामरती के
सामने जी-जान से काम में लगे रहते थे और मैकू अपनी दुनियादारी में व्यस्त रहता था,
रामरती के न रहने पर स्वयं को असहाय महसूस कर रहे थे। उनको लग रहा था कि अब उनकी
उपेक्षा हो रही है, उनकी मालकिन नहीं रहीं। हालात तो यहां तक बिगड़े कि मैकू की
जमीन में बसे काम करने वालों से ही मैकू की लड़ाई हो गयी। इसी चक्कर में मैकू ने
अपनी लाइसेंसी बंदूक से फायर भी कर दिया। उन गरीबों का गुस्सा भड़क गया और सभी ने
मिलकर मैकू की खूब खातिरदारी की और मैकू के खिलाफ रिपोर्ट भी लिखवा दी। मैकू कहां
मानने वाला था। उसको लगा कि यह उसका भारी अपमान है। उसने थाने में पैसा खिलाया और
एस.सी, एस.टी. एक्ट को कमजोर करवाने के लिये काफी पैसा खर्च किया। केस कमजोर तो हो
गया, लेकिन खतम नहीं हुआ। ऊपरी अदालत में मैकू ने विपक्षियों के कमजोर और गरीब
होने का फायदा उठाया और लंबी लड़ाई के बाद सत्य को पराजित कर दिया। संभवतः मैकू का
जन्म ही सत्य को हराने एवं डराने के लिये हुआ था। धन एवं प्रभाव की कमी के कारण
बेचारे पीड़ित हाईकोर्ट नहीं जा पाये।
हां तो
इस घटना के उपरांत मैकू का साहस और बढ़ गया। किसी बात को लेकर मैकू की पड़ोसी गांव
के ठाकुरों से विवाद हो गया। इस समय सफलताओं की ऊंचाइयों पर चढा हुआ मैकू कहां
किसी से दबने वाला था। संपन्न ठाकुरों को
उसकी हिमाकत पसंद नहीं आयी। रात के अंधेरे में कहीं से लौटते समय उन्होंने मैकू की
जमकर खातिदारी की। काफी समय तक मैकू अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ करते रहे। पैसा भी
काफी खर्च हुआ। कुछ दिन तक तो मैकू ठीक रहे, लेकिन उनका मन फिर उल्टे-सीधे कार्यों
के लिये अकुलाने लगा। उन्होंने रामरती के मायके वालों के जो विपक्षी थे, उनसे
मिलकर पुनः दुष्चक्र रचना प्रारंभ कर दिया। केस में चूंकि कोई अपेक्षित प्रगति
नहीं हो पा रही थी। सभी प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर रामरती के मायके वालों को
स्टे मिल गया था। मैकू ने सोचा कि ऐसे तो केस चलता ही रहेगा, तो उसने विपक्षी
पार्टी को हराने के लिये उनके पैरोकारों को ही धनबल व लालच देकर प्रभावित करने की
कोशिश की। सभी तो नहीं झुके लेकिन एक धड़ा गद्दारी करने के लिये तैयार हो गया। इसी
बीच मैकू ने न्यायालय में रीडर से मिलकर केस को प्रभावित करने हेतु कोशिश की।
जिसके तहत विपक्षी पार्टी को गवाह पेश करने की सूचना ही नहीं दी गयी और दो-तीन
अवसर दिखाकर केस को एक्स पार्टी करवाने का प्रयास हुआ। रामरती के मायके वालों को
जब पता चला तो उन्होंने ऊपरी अदालत में रिस्टोरेशन के लिये आवेदन कर दिया।
कहते
हैं कि ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं। यह बात मैकू पर सोलहों आने सच निकली। मैकू
अपनी पत्नी के मायके की संपत्ति के लिये लड़ रहे थे और इसी बीच मैकू की ब्याहता
लड़की जिसका ससुराल में तालमेल नहीं बैठ पाया तो मायके आ गई और कहने लगी मुझको भी
कुछ हिस्सा दे दो। मैं ससुराल नहीं जाऊंगीं। मैकू ने दामाद को कुछ जमीन बेचकर
ठेकेदारी का कार्य दिलवा दिया। अब बेटी और दामाद मैकू के घरजमाई बन गये। लोग अपने
सामने कहने लगे कि भगवान न्यय कर रहा है। कुछ लोग तो दबी जुबान कहने लगे की मैकू
के बेटे को अब अपनी संपत्ति से हाथ धोना पड़ेगा।
पिता
के फैसले से नाराज होकर मैकू का इकलौता पुत्र नाराज होकर घर से बाहर, पुत्रों को
पढ़ाने के नाम पर अपनी पत्नी के साथ रहने लगा। बीच-बीच में वह घर आया-जाया करता
था। मैकू का स्वास्थ्य भी अब खराब रहने लगा था। मैकू झटके-पर झटका झेल रहा था,
लेकिन अपने कारनामों से बाज नहीं आ रहा
था। मैकू ने अपने काम को करवाने के लिये अपने एक साले को अपने घर पर रख रखा था,
जिसकी पत्नी ने उससे नाराज होकर आत्महत्या करके जान दे दी। एक घर और मैकू ने उजाड़
दिया। भगवान के बही-खाते मैं मैकू की एक और गलती जुड़ गयी।
मैकू
ने देखा की अगर बस खरीद लिया जाय तो काफी फायदा हो सकता है। मेरा बेटा भी जिला से
बराबर घर आता-जाता रहेगा और मैं उनकी देख-भाल कर अच्छा व्यवसाय कर सकूंगां। एक
फायदा और होगा मुझे तहसील जाने के लिये किराया आदि नहीं खर्च करना पड़ेगा। मैकू ने
अपने दामाद से इस संबंध में वार्ता की और जमीन का कुछ हिस्सा बेचकर कहीं से एक
पुरानी बस ले आये। बस चलने लगी। कहते हैं कि लोहा हर आदमी को नहीं फलता है। मैकू
को भी कोई खास फायदा नहीं हो पा रहा था। कुछ लोगों ने सलाह दी कि यदि एक और बस हो
जाये तो बुकिंग एवं रोड पर चलने से काफी फायदा होगा। परमिट एक गाड़ी का रहेगा तथा
जरूरत पड़ने पर दूसरी गाडी का भी प्रयोग किया जा सकेगा। मैकू के दिमाम में बस का
बिजनेस घुस चुका था। मैकू ने पुनः कुछ जमीन बेची और एक और पुरानी गाड़ी खरीद ली।
कुछ ऐसा संयोग बना कि दूसरी गाड़ी खराब होने लगी। मैकू उससे कमाने की बजाय उस पर
लगाने लगे। गैराज में खड़ी करने का खर्चा अलग से आ रहा था। लेकिन लोगों को दिखाना
था, सो मैकू को भले ही और जमीन बेचनी पड़ती मैकू पीछे कैसे हटते।
कहावत
है कि जमीन-जमीन को ले आती है, तो ले भी जाती है। मैकू के साथ यही हो रहा था। पहले
तो उसके पास काफी इधर-उधर की जमीनें आईं, लेकिन इधर गलत ढंग से कमायी गई दौलत और
जमीन दोनों ही साथ छोड़ रही थीं। मैकू मृगमरीचिका के चक्कर में रामरती के मायके की
जमीन को पाने के लिये परेशान था। वह बाकी बची जमीन को भी लाइन से लगा रहा था। उसके
कुछ सच्चे हितैषी उसको समझाते थे कि दंदःफंद छोड़ो, अपनी जमीन और व्यवसाय पर ध्यान
दो, लेकिन मैकू को चैन नहीं आ रहा था। अब मैकू कचेहरी किसी की मदद से जाते थे,
लेकिन तीन-पांच से बाज नहीं आते थे।
पेशी-दर-पेशी,
साल-दर-साल बहस चलती रही। कोर्ट बदलते रहे। मैकू जर्जर और श्रीहीन शरीर लिये दूसरे
की जमीन को पाने के लिये भागते रहे। समाज में मैकू की आलोचना होती रही, लेकिन वे
इनसे बेफिक्र हो चुके थे। जैसे चोर जब एक बार पकड़ लिया जाता है, तो उसको फिर
बदनामी का कोई डर नहीं रहता। उसी प्रकार मैकू के लिये अब एकसूत्रीय कार्यक्रम
रामरती के हिस्से की जमीन को पाना रह गया था। समय बीतता रहा मैकू अब भी लालसा लिये
दौड़ रहा था। जमीन पर मायके वालों का कब्जा था।
कोर्ट,
कचेहरी में जगह-जगह गलत को सही करवाने के लिये पैसे देते-देते मैकू भी हार चुका
था। उसको अब अपनी गलती समझ में आ रही थी। उसे लगने लगा था कि उसका निर्णय नितांत
गलत था। आखीर में उसने एक और चाल चली। विपक्षियों को पुनः तोड़ने के लिये सुलहनामा
की पेशकश अलग-अलग लोगों से अलग-अलग समय में की। कुछ लोग लालच में फंसे, लेकिन मैकू
के पिछले रिकार्ड को याद करके अपने निर्णय से पीछे हट गये। ऐसे ही एक तारीख पर
मैकू कचेहरी गया हुआ था। संयोगवश उसके साथ कोई जा नहीं पाया था। मैकू के सीने में
अचानक तेज दर्द उठा। उसे पहले भी दो-तीन बार हार्टअटैक पड़ चुका था, लेकिन भगवान
की कृपा और समय पूरा न होने के कारण मैकी के जिंदगी की गाड़ी दवाइयों के सहारे चल
रही थीं। असहनीय दर्द से छटपटाता हुआ मैकू कचेहरी में ऐसा गिरा कि फिर उठ नहीं
पाया। तमाम उम्र लोगों को कोर्ट-कचेहरी के चक्कर लगवाने वाला और पैसों के दम पर
हरदम जीतने वाला मैकू आज भगवान की अदालत में हार चुका था।
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दया शंकर मिश्र,
आशुलिपिक, NSI,
कानपुर
ये
वीरों की धरती
ये वीरों की धरती, सपूतों की धरती।
मेरा दर्द हरती, मुझे धन्य करती।
मुझे मॉं-सा पाला, नहीं गम में डाला,
सुबह-शाम मुझको खिलाया निवाला।
नहीं प्रेम मुझसे, कभी कम ये करती।
ये वीरों की धरती, सपूतों की धरती।
मेरा दर्द हरती, मुझे धन्य करती।1।
गिराया, उठाया, उठाकर बिठाया,
बिठाकर उठाया, उठाकर सुलाया।
कभी खिलखिलाया, कभी गुनगुनाया,
कभी मुस्कुराया, कभी तिलमिलाया।
हरेक गम औ खुशियों में संग मेरे रहती।
ये वीरों की धरती, सपूतों की धऱती
मेरा दर्द हरती, मुझे धन्य करती।2।
कभी दंड देती, कभी मान देती,
ये हंसकर के देती और रोकर के लेती।
हंसाती, रूलाती, रूलाती, हंसाती,
विविध रूप जीवन के हमको दिखाती।
प्रसू-वीरों की ये, सदा शस्य रहती।
ये वीरों की धरती, सपूतों की धरती,
मेरा दर्द हरती, मुझे धन्य करती।3।
दया शंकर मिश्र,
आशुलिपिक, NSI,
कानपुर
प्यासी धरा है,
प्यासी तलैया
तपते हैं अब
खेत-मड़ैया।
कितना और
तड़पाओगे ?
मेघ कब आओगे ?
गलियों में
धूलों की आंधी,
तुमने कैसी
रचना बांधी।
गली, मोहल्ले
और कूचों की
फिर कब प्यास
बुझाओगे ?
मेघ कब आओगे ?
प्यासे
चकवा-चकई देखें
कवियों की
कविता में लिक्खे
मृगमरीचिका है
इस मन की
सावन कब
बरसाओगे ?
मेघ कब आओगे ?
नींद रात में
किसको आती
गर्मी से आंखें
खुल जातीं
दिन और रैन तपन
में डूबे
कब हरियाली
लाओगे ?
मेघ कब आओगे ?
अद्भुत लेखनी
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