हास्य कविता (नारी सशक्तिकरण)
नारी सशक्तिकरण
जब से श्रीमती जी को पता चला है कि,
संस्थान की निदेशक परोहा मैडम
सहायक निदेशक मल्लिका मैडम और
जैव रसायन प्रमुख लक्ष्मी मैडम हो गईं हैं
उस दिन से मेरे घर की प्रमुख भी मेरी श्रीमती
जी हो गईं हैं।
अब घर पर मेरी नहीं, उनकी ही चलती है
जल्दी से मेरी वहां, दाल नहीं गलती है।
जब भी चंडी रूप धारण करती हैं, कहती हैं सब
तुम्हारी ही गलती है।।
विवाह से पूर्व मैं नहीं जानती थी कि, तुम
कविता भी लिखते हो,
पहले तो ऐसे नहीं लिखते थे, जैसे अब लिखते
हो।
मुझे पता चल जाता, तो मैं तुमसे शादी ही नहीं
करती।
तुम भी मोदी, योगी और अटल की तरह कुंवारे
ही रहते
और कुछ करते न करते, देश की सेवा तो करते।
अरे, कवियों की कोई औकात होती है//
महिलाओं के सामने पुरूषों की कोई बिसात
होती है।
संस्थान को मैडम ने और घर को हमने संभाला
है
हमारी ही बदौलत, तुम सबके मुंह में, समय
से जाता निवाला है।
क्या तुम जैसे सांप को हमने इसीलिये पाला
है।
सच कहती हूं, कभी-कभी मुझे लगता है,
तुम्हारा दिल ही काला है।
कभी खुद भोजन पकाओ तो जान जाओगे कि,
कितनी मशक्कत के बाद नारी अन्नपूर्णा बनती
है।
रोटी जैसे तवे पे नाचती है, वैसे ही अब
मैं तुमको भी नचाऊंगीं।
अगर सात दिन के अंदर तुमको अगर दिन में
तारे नहीं दिखा दिया
तो अपने बाप की बेटी नहीं कहाऊंगी।
उनकी धमकी सुनकर, मुझे सर्दी में भी पसीने
आ गये
भगवान तो भगवान हैं, मुझे सात पुरखे भी
याद आ गये।
श्रीमती जी यहीं नहीं रूकीं, बोलीं-अब
नारी सशक्तीकरण का दौर आ गया है।
सारी दुनिया में नारी का परचम लहरा गया
है।
तुम घर में बैठो या आफिस जाओ,
चाहे कविता लिखो, चाहे चोरी करो पर पैसे
जरूर कमाओ
आज से सारा घर मैं ही चलाऊंगी।
झाड़ू भी तुम लगाओ, तुमसे बर्तन भी
मंजवाऊंगीं।
मुझ पर अत्याचार करते हुये कामवाली की
छुट्टी कर दिया है
सबको वश में करने के लिये घुट्टी भर दिया
है
बेटे, बेटी, बहू सब पर अपना होल्ड कर लिया
है।
मुझको क्रिकेट के खिलाड़ी की तरह
क्लीनबोल्ड कर दिया है।
सच कहता हूं दोस्तो, अब मैं जिंदगी की जंग
हार गया हूं
अपनी सारी इच्छाओं को, कुंभ के नागाओं की
तरह मार गया हूं
अब मैं रोज जल्दी घर जाता हूं,
भोजन पकाता हूं, बर्तन धोता हूं।
और सुबह की चिंता करते-करते सो जाता हूं।
सुबह की चिंता करते-करते सो जाता हूं।
-दया शंकर मिश्र “सागर”
NSI, Kanpur Mob. 9415429279
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