सुहाने दिन

सुहाने दिन

उन्हें आजमाने के दिन आ गये हैं।

लो खुशियां मनाने के दिन आ गये हैं।

यादों की बारात लेकर वो आये,

सखी अब सुहाने से दिन आ गये हैं।

उन्हें हमने सपनों में देखा था अकसर,

लो मिलने-मिलाने के दिन आ गये हैं।

वो पत्थर नहीं हैं, नरम दिल है उनका,

अब उनको मनाने के दिन आ गये हैं।

सखी अब सुहाने से दिन आ गये हैं।

                   --0-- दया शंकर मिश्र "सागर"

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