समाज के विषैले सांप

 
जनसंख्या वृद्धि
बढ़ती जनसंख्या ने
सांपों के रहने की जगह छीन ली है।
बेचारे कहां बनायें बिल,
छोटे हो गये हैं लोगों के दिल।
शहरीकरण ने सांपों का चैन छीन लिया है।
अब पैदा हो गये हैं समाज में
कुछ अलग किस्म के जहरीले नाग।
जो लगाते रहते हैं समाज में
अपनी विषबुझी बातों से आग।
इनके विषदंत, मुंह में नहीं, पेट में हैं।
जिससे इनके विषैलेपन को कोई देख नहीं पाता है।
इनमें से आम सांपों की तरह
कुछ कम, तो कुछ ज्यादा जहरीले हैं।
कुछ सीधे-सादे तो कुछ छैल-छबीले हैं।
जब करते हैं विष-वमन तो
समाज में मच जाती है खलबली।
करवा देते हैं ब़ड़े-बड़े दंगे मिनटों में।
ये करोड़पति को खाकपति बना देते हैं पल भर में।
नागदेवता तो केवल नागपंचमी को दूध पीते हैं
पर ये विषधर, बाप-रे-बाप
कितना है इनके अंतःस्थल में ताप।
ये दूध पिलानेवाले को ही डसते हैं।
नफरत रूपी जहर बांटते हैं।
क्या करेंगें ये समाज का कल्यान,
ये तो खुद ही हैं, छुपे हुये शैतान।
लाशों पे राजनीति करना और
घड़ियाली आंसू बहाना इनका है कर्म।
नहीं समझ पाया आज तक कोई इनका मर्म।
          --0—
                  दया शंकर मिश्र सागर
                  राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपुर

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