मेरा गांव और शहर

 

                     मेरा गांव और शहर


                दो कदम तुम भी बढ़ो, दो कदम हम भी बढ़ें

                दो-दो कदम बढ़ने से फासला घट जाता है।

                ये मेर गांव वाला दिल है, शहर वाला नहीं ऐ दोस्त,

                दो बोल प्यार के सुन, खुशी से भर जाता है।

                कुछ भी न दो ठीक है, दुत्कारो, भगाओ तो नहीं,

                क्योंकि ऐसा करने से दिल भर आता है।

                चाहे मान ना दो, बात तो मान की करो,

                मान देने-लेने से ही, सम्मान बढ़ जाता है।

                आज के दौर में गांवों की हो रही है कमी,

                दो पैसे कमा लिये तो व्यक्ति शहरी बन जाता है।

                हमने पूजा बहुत देश को एक शिद्दत से,

                अब तो पूजा में भी मुझे इक गांव नजर आता है।

                कोई अंतर नहीं है, मंदिर और मस्जिद में,

                मन अगर मंदिर हो तो मालिक मिल जाता है।

                ऐ मेरे दोस्त, दुआ है कि –

                रहे सलामत, मेरा गांव, मेरा देश,

                मुझे तो मेरे गांव में हर भाव नजर आता है।

            -दया शंकर मिश्र सागर

            NSI, Kalyanpur, Kanpur

            Mob. 9415429279

 

Comments

  1. समाज की सच्चाई से रूबरू कराने वाली कविता......अद्भुत

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