सड़क

 

मैं सड़क हूं,
स्वभाव से कड़क हूं।
आप दो दिलों को नहीं जोड़ पाते,
मैं गांव को शहर से,
शहर को जिले से,
जिले को राज्य से,
राज्य को देश से और
देश को विदेश से जोड़ती हूं।
मैं सड़क हूं
कितने पथिक और वाहन,
दिन-रात चलते हैं मुझ पर
कुछ पहुंचते हैं मंजिल पर
और कुछ जल्दबाजी में
पहुंच जाते हैं यमराज के घर।
दिवंगत पथिकों की पत्नी और परिजन,
रोते हैं, बिसूरते हैं
उनको याद कर-कर।
मैं सड़क हूं।
मैं कल भी थी, आज भी हूं
और कल भी रहूंगीं।
जोड़ती रहूंगी सीमाओं को।
मेरा विस्तार होता ही रहेगा
गढ़ती रहूंगी विकास-गाथा मैं।
मैं सड़क हूं..
मेरे लिये सभी प्रिय हैं
चाहे भाजपा हो, सपा हो या कांग्रेस हो
मैं पंजे, साइकिल, हाथी और कमल से
बराबर प्यार करती हूं।
सत्ता तो आती, जाती रहती है।
पर मैं रहती हूं चिरंतन।
मैं मिलाती हूं दूर रहने वाले साथी को साथी से।
प्रिय को प्रियतमा से और आत्मा को परमात्मा से।
मैं सड़क हूं..
मेरा काम ही एक को दूसरे से जोड़ना है
और नेताओं का काम लोगों को तोड़ना है।
मैं सड़क हूं, आखिर मैं सड़क हूं।
--00—
दया शंकर मिश्र सागर
राष्ट्रीय शर्करा संस्थान,
कानपुर
मो. 9415429279

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