पिता की चिंता

 

पिता की चिंता

एक पिताजी अपने बेटे को समझा रहे थे।

विवाह करने हेतु उपाय बतला रहे थे।

कह रहे थे, बेटा, थोड़ा-थोड़ा भार उठाया करो,

पास की किसी जिम में, रोज-रोज जाया करो।

इससे तुम्हें भार्या का भार, उठाने की आदत पड़ जायेगी।

हो सकता है, वहीं कोई सलोनी कुड़ी पट जायेगी।।

बहुत सी कन्यायें भी जिम जाती हैं,

स्लिम होने के लिये खाना कम खाती हैं।

तुम भी कोई, भगीरथ प्रयास करो,

श्रीगणेश से कहो, मेरी विघ्न बाधा हरो।

लड़कियों का अनुपात, धीरे-धीरे कम हो रहा है।

तुम्हें कुंवारा देखकर, मुझे गम हो रहा है।।

तुम्हारी सींकिया पहलवानों सी काया।

तुम्हारे पास नहीं है कोई माया।।

उस पर तुर्रा ये कि,

आज तलक तुमको कोई नहीं भाया।

इसलिये, अब अपनी अवस्था का ध्यान धरो।

अपनी ढलती उम्र देख,

अपनी कुछ व्यवस्था करो।।

और अपने लिये किसी सहगामिनी की,

संग-संग चलने वाली गजगामिनी की

आनन फानन में खोज करो।।

और मेरे चिता पर जाने से पहले,

मेरी बहुत बड़ी चिंता को दूर करो।।

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                          दया शंकर मिश्र सागर

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